योग चिन्मय! प्रेम तो धुंधला होगा ही, क्योंकि प्रेम रहस्य है। वासना स्पष्ट होगी और प्रार्थना भी स्पष्ट होगी। प्रेम तो दोनों का मध्य है। प्रेम तो तरल अवस्था है। न तो प्रेम वासना है और न प्रेम प्रार्थना है, प्रेम दोनों के मध्य की कड़ी है; संक्रमण का काल है। संक्रमण का काल तो धुंधला होगा ही, अनिवार्यतया धुंधला होगा। तुम्हारे लिए ही ऐसा है, ऐसा नहीं; सभी के लिए ऐसा है।
वासना तो साफ है। मिट्टी की पकड़ है। पर के ऊपर शिकंजा है। प्रकृति की दौड़ है। जीव-विज्ञान की तुम्हारे ऊपर अंधी जकड़ है। सब साफ-साफ है। वासना में कुछ उलझा हुआ नहीं है। वासना गणित जैसी साफ है।
और प्रार्थना भी साफ है। क्योंकि वासना है पदार्थ के लिए, प्रार्थना हैपरमात्मा के लिए; दोनों का विषय स्पष्ट है। एक तीर जा रहा पदार्थ की तरफ; उसका लक्ष्य भी साफ है। एक तीर जा रहा है परमात्मा की तरफ; उसका भी लक्ष्य साफ है। लेकिन प्रेम का तीर कहीं भी नहीं जा रहा न पदार्थ की तरफ, न परमात्मा की तरफ। प्रेम को तीर अभी तूणीर में है। इसलिए अड़चन होती है कि यह प्रेम के तीर का प्रयोजन क्या है? इसका लक्ष्य क्या है? और लक्ष्य साफ न हो तो प्रेम अस्पष्ट रह जाता है, धुंधला-धुंधला रह जाता है। लगता तो है कुछ है, मगर क्या है, ठीक-ठीक मुट्ठी नहीं बंधती, तराजू पर नहीं तुलता, नाप-जोख में नहीं आता। वासना भी नाप-जोख में आ जाती है।
इसलिए इस जगत में भोगी भी स्पष्ट है और त्यागी भी स्पष्ट है। दोनों के गणित बिल्कुल सुसंबद्धित, सुरेखाबद्ध हैं। कवि अस्पष्ट है। कवि तरल है, कवि ठोस नहीं है। कवि दोनों के मध्य है।अगर विज्ञान वासना है तो धर्म प्रार्थना है और काव्य प्रेम है। लेकिन जिसे भी वासना से प्रार्थना तक जाना हो उसे प्रेम की घड़ी से गुजरना ही होगा।
एक स्त्री अभी गर्भवती नहीं है, सब स्पष्ट है। फिर एक दिन उसको बच्चा पैदा हो जाएगा, मां बन गई, तब भी सब स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन दोनों के मध्य में वह जो नौ महीने का गर्भ है, सब अस्पष्ट रहेगा, धुंधला-धुंधला रहेगा। कुछ-कुछ एहसास भी होगा कि है, मगर कौन है? बेटा होनेवाला है कि बेटी होनेवाली है? सुंदर होगा, असुंदर होगा? बुद्ध होगा, बद्धिमान होगा? काला होगा, गोरा होगा? सब अस्पष्ट है? कुछ पकड़ में नहीं आता।
प्रेम की अवस्था गर्भ की अवस्था है। वासना प्रार्थना बनने के मार्ग पर जब चलती है तो यह पड़ाव आता है। यह पड़ाव शुभ है। घबड़ाओ मत।
और हर चीज को स्पष्ट करने की जरूरत भी क्या है? कुछ तो अस्पष्ट रहने दो! यह हमें कैसा पागलपन पकड़ा है...सारी दुनिया को पकड़ा है, कि हर चीज स्पष्ट होनी चाहिए! एक महान रोग आदमी को सता रहा है कि हर चीज को स्पष्ट करो। और जो चीज स्पष्ट न होती हो वह हमको इतनी बेचैनी देती है कि बजाए इसके हम स्वीकार करने के कि वह अस्पष्ट है, यही स्वीकार करना पसंद करेंगे कि वह है ही नहीं।
इसलिए बहुत-से तथ्यों को विज्ञान ठुकराता है। ठुकराने का कारण यह नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं और कारण यह भी नहीं है कि उन तथ्यों की प्रतीति नहीं होती विज्ञान को। मगर मजबूरी यह है कि वे स्पष्ट नहीं होते, धुंधले-धुंधले हैं। और विज्ञान जब तक स्पष्ट न हो जाए, कोई चीज पकड़ेगा नहीं। स्पष्टता के लिए उसने कसम खा रखी है। उसने एक आबद्धता मान रखी है, एक कमिटमेंट, प्रतिबद्ध हो गया है कि स्पष्ट तो होना ही चाहिए। उसने स्पष्टता की बलिवेदी पर सब कुछ चढ़ा दिया है। तो जो स्पष्ट नहीं है, वह इंकार कर देना है।
प्रेम बड़ी अस्पष्ट घटना है रहस्यपूर्ण, धुंधली-धुंधली, तरल रूप उसके बदलते हैं, रोज-रोज बदलते हैं, प्रतिपल बदलते हैं। सिर्फ आभास ही अनुभव होता है। एक छाया मात्र अनुभव होती है।
योग चिन्मय! यह तुम्हारी ही कठिनाई नहीं है, यह उन सभी साधकों की कठिनाई है जो वासना से प्रार्थना की तरफ चलेंगे। और सभी को चलना है, क्योंकि सभी वासना में पैदा हुए हैं और सभी को प्रार्थना पर पहुंचना है। बीच में यह पड़ाव आएगा जब वासना छूट गई और प्रार्थना अभी आई नहीं। वह जो बीच का रिक्त स्थान है, उस रिक्त स्थान को सहने का नाम ही तपश्चर्या है। उस रिक्त स्थान में धैर्य रखना ही तपश्चर्या है
उस रिक्त स्थान में भी शांत बने रहना, अनुद्विग्न, अति आकांक्षा न करना स्पष्टता की, क्योंकि अगर अति आकांक्षा करोगे स्पष्टता की, तो संभव है, वापिस लौट जाओगे। वासना में वापिस गिर जाओगे। क्योंकि वासना ही परिचित है। फिर स्पष्ट हो जाएगी सब बातें। प्रार्थना तो बिल्कुल अपरिचित है, अज्ञात लोक है। लेकिन अगर कोई धैर्यपूर्वक प्रेम के गर्भ में नौ महीने रह जाए तो उसका एक नया जन्म होता है, प्रार्थना का जन्म होता है, भक्त का आविर्भाव होता है।
और प्रार्थना फिर स्पष्ट है, सब स्पष्ट है, खुली सूरज की धूप में, जैसे सब स्पष्ट है, ऐसा सब स्पष्ट है। कुछ भी छिपा नहीं, कुछ भी अस्पष्ट नहीं। हालांकि तुम कह न पाओगे, इतना भेद है। वासना की स्पष्टता ऐसी है कि कही जा सकती है; प्रार्थना की स्पष्टता ऐसी है कि तुमसे इतनी बड़ी है कि तुम न कह पाओगे। यह मत सोचना कि बुद्ध ने नहीं कहा, इसलिए उन्होंने नहीं जाना। जाना तो जरूर, लेकिन कहा नहीं। क्योंकि जानना जाननेवाले से बड़ा था। इसलिए चुप रह गए।
वासना को बड़े मजे से कहा जा सकता है, कोई भी कह सकता है। पशु-पक्षी भी निवेदन कर देते हैं, आदमी की तो बात ही छोड़ दो। वासना के निवेदन में लगता ही क्या है, कोई बड़ी कला, कोई बड़ी कुशलता, कोई प्रतिभा, कोई बहुत बुद्धिमान होना आवश्यक नहीं है। बुद्ध भी अपनी ग चिन्मय! प्रेम तो धुंधला होगा ही, क्योंकि प्रेम रहस्य है। वासना स्पष्ट होगी और प्रार्थना भी स्पष्ट होगी। प्रेम तो दोनों का मध्य है। प्रेम तो तरल अवस्था है। न तो प्रेम वासना है और न प्रेम प्रार्थना है, प्रेम दोनों के मध्य की कड़ी है; संक्रमण का काल है। संक्रमण का काल तो धुंधला होगा ही, अनिवार्यतया धुंधला होगा। तुम्हारे लिए ही ऐसा है, ऐसा नहीं; सभी के लिए ऐसा है।
वासना तो साफ है। मिट्टी की पकड़ है। पर के ऊपर शिकंजा है। प्रकृति की दौड़ है। जीव-विज्ञान की तुम्हारे ऊपर अंधी जकड़ है। सब साफ-साफ है। वासना में कुछ उलझा हुआ नहीं है। वासना गणित जैसी साफ है।
और प्रार्थना भी साफ है। क्योंकि वासना है करोपदार्थ के लिए, प्रार्थना है परमात्मा के लिए; दोनों इतनी का विषय स्पष्ट है। एक तीर जा रहा पदार्थ की तरफ; उसका लक्ष्य भी साफ है। एक तीर जा रहा है परमात्मा की तरफ; उसका भी लक्ष्य साफ है। लेकिन प्रेम का तीर कहीं भी नहीं जा रहा–न पदार्थ की तरफ, न परमात्मा की तरफ। प्रेम का तीर अभी तूणीर में है। इसलिए अड़चन होती हैकि यह प्रेम के तीर का प्रयोजन क्या है? इसका लक्ष्य क्या है? और लक्ष्य साफ न हो तो प्रेम अस्पष्ट रह जाता है, धुंधला-धुंधला रह जाता है। लगता तो है कुछ है, मगर क्या है, ठीक-ठीक मुट्ठी नहीं बंधती, तराजू पर नहीं तुलता, नाप-जोख में नहीं आता। वासना भी नाप-जोख में आ जाती है।
इसलिए इस जगत में भोगी भी स्पष्ट है और त्यागी भी स्पष्ट है। दोनों के गणित बिल्कुल सुसंबद्धित, सुरेखाबद्ध हैं। कवि अस्पष्ट है। कवि तरल है, कवि ठोस नहीं है। कवि दोनों के मध्य है
अगर विज्ञान वासना है तो धर्म प्रार्थना हैऔर काव्य प्रेम है। लेकिन जिसे भी वासना से प्रार्थना तक जाना हो उसे प्रेम की घड़ी से गुजरना होगा।
एक स्त्री अभी गर्भवती नहीं है, सब स्पष्ट है। फिर एक दिन उसको बच्चा पैदा हो जाएगा, मां बन गई, तब भी सब स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन दोनों के मध्य में वह जो नौ महीने का गर्भ है, सब अस्पष्ट रहेगा, धुंधला-धुंधला रहेगा। कुछ-कुछ एहसास भी होगा कि है, मगर कौन है? बेटा होनेवाला है कि बेटी होनेवाली है? सुंदर होगा, असुंदर होगा? बुद्ध होगा, बद्धिमान होगा? काला होगा, गोरा होगा? सब अस्पष्ट है? कुछ पकड़ में नहीं आता।
मत।। प्रेम की अवस्था गर्भ की अवस्था है। वासना प्रार्थना बनने के मार्ग पर जब चलती है तो यह पड़ाव आता है। यह पड़ाव शुभ है। घबड़ाओ
और हर चीज को स्पष्ट करने की जरूरत भी क्या है? कुछ तो अस्पष्ट रहने दो! यह हमें कैसा पागलपन पकड़ा है...सारी दुनिया को पकड़ा है, कि हर चीज स्पष्ट होनी चाहिए! एक महान रोग आदमी को सता रहा है कि हर चीज को स्पष्ट करो। और जो चीज स्पष्ट न होती हो वह हमको इतनी बेचैनी देती है कि बजाए इसके हम स्वीकार करने के कि वह अस्पष्ट है, यही स्वीकार करना पसंद करेंगे कि वह है ही नहीं।
इसलिए बहुत-से तथ्यों को विज्ञान ठुकराता । ठुकराने का कारण यह नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं और कारण यह भी नहीं है कि उन तथ्यों की प्रतीति नहीं होती विज्ञान को। मगर मजबूरी यह है कि वे स्पष्ट नहीं होते, धुंधले–धुंधले हैं। और विज्ञान जब तक स्पष्ट न हो जाए, कोई चीज पकड़ेगा नहीं। स्पष्टता के लिए उसने कसम खा रखी है। उसने एक आबद्धता मान रखी है, एक कमिटमेंट, प्रतिबद्ध हो गया है कि स्पष्ट तो होना ही चाहिए। उसने स्पष्टता की बलिवेदी पर सब कुछ चढ़ा दिया है। तो जो स्पष्ट नहीं है, वह इंकार कर देना है।
प्रेम बड़ी अस्पष्ट घटना है-रहस्यपूर्ण, धुंधली-धुंधली, तरल रूप उसके बदलते हैं, रोज-रोज बदलते हैं, प्रतिपल बदलते हैं। सिर्फ आभास ही अनुभव होता है। एक छाया मात्र अनुभव होती है।
योग चिन्मय! यह तुम्हारी ही कठिनाई नहीं निवेदन है, यह उन सभी साधकों की कठिनाई है जो वासना से प्रार्थना की तरफ चलेंगे। और सभी को चलना है, क्योंकि सभी वासना में पैदा हुए हैं और सभी को प्रार्थना पर पहुंचना है। बीच में यह पड़ाव आएगा जब वासना छूट गई और प्रार्थना अभी आई नहीं। वह जो बीच का रिक्त स्थान है, प्रार्थना उस रिक्त स्थान को सहने का नाम ही तपश्चर्या है। उस रिक्त स्थान में धैर्य रखना ही तपश्चर्या है
उस रिक्त स्थान में भी शांत बने रहना, अनुद्विग्न, अति आकांक्षा न करना स्पष्टता की, क्योंकि अगर अति आकांक्षा करोगे स्पष्टता की, तो संभव है, वापिस लौट जाओगे। वासना में वापिस गिर जाओगे। क्योंकि वासना ही परिचित है। फिर स्पष्ट हो जाएगी सब बातें। प्रार्थना तो बिल्कुल अपरिचित है, अज्ञात लोक है। लेकिन अगर कोई धैर्यपूर्वक प्रेम के गर्भ में नौ महीने रह जाए तो उसका एक नया जन्म होता है, प्रार्थना का जन्म होता है, भक्त का आविर्भाव होता है।
और प्रार्थना फिर स्पष्ट है, सब स्पष्ट है, खुली सूरज की धूप में, जैसे सब स्पष्ट है, ऐसा सब स्पष्ट है। कुछ भी छिपा नहीं, कुछ भी अस्पष्ट नहीं। हालांकि तुम कह न पाओगे, इतना भेद है। वासना की स्पष्टता ऐसी है कि कही जा सकती है; प्रार्थना की स्पष्टता ऐसी है कि तुमसे इतनी बड़ी है कि तुम न कह पाओगे। यह मत सोचना कि बुद्ध ने नहीं कहा, इसलिए उन्होंने नहीं जाना। जाना तो जरूर, लेकिन कहा नहीं। क्योंकि जानना जाननेवाले से बड़ा था। इसलिए चुप रह गए।
वासना को बड़े मजे से कहा जा सकता है. कोई भी कह सकता है। पशु-पक्षी भी निवेदन कर देते हैं, आदमी की तो बात ही छोड़ दो। वासना के निवेदन में लगता ही क्या है, कोई बड़ी कला, कोई बड़ी कुशलता, कोई प्रतिभा, कोई बहुत बुद्धिमान होना आवश्यक नहीं है। बुद्ध भी अपनी वासना प्रकट कर देते हैं। वासना बड़ी छोटी है, क्षुद्र है। प्रार्थना विराट है, आकाश जैसी है। प्रकट न कर सकोगे, लेकिन यह ध्यान रखना कि प्रार्थना स्पष्ट पूरी हो जाती है।
जब तुम आकाश की तरफ देखते हो तो क्या तुम सोचते हो आकाश स्पष्ट नहीं है? स्पष्ट है, लेकिन किस शब्द में समाओ इसे? जब करोड़-करोड़ तारों के सौंदर्य को तुम देखते हो तो क्या कुछ अस्पष्ट है? सब स्पष्ट है। और स्पष्ट ज्यादा क्या होगा? मगर कैसे बांधो इसे, कैसेकहो? इसका निर्वाचन कैसे हो, व्याख्या कैसे हो? जबान लड़खड़ा जाती है। स्वाद इतना बड़ा है कि जबान लड़खड़ा जाती है। वासना भी स्पष्ट, क्षुद्र, प्रार्थना भी स्पष्ट, विराट। प्रेम अस्पष्ट है। प्रेम मध्य में है—न इधर न उधर।
इसलिए योग चिन्मय, ऐसा मत सोचना कि यह धुंधलापन तुम्हें ही अनुभव हो रहा है। इसको अकारण ही अपनी समस्या मत बना लेना। यह सबकी समस्या है। और धन्यभागी हैं वे जिन्हें यह समस्या अनुभव होती है। अधिक को तो यही लगता है कि वासना सब कुछ है। और ऐसा भी नहीं है कि ये वासना से ग्रस्त लोग प्रार्थना न करते हों, मगर इनकी प्रार्थना झूठी है, इनका मंदिर औपचारिक है। ये कभी-कभी प्रार्थना भीकर आते हैं, मगर इनकी प्रार्थना भी वासना का ही एक नाम है। प्रार्थना के बहाने भी परमात्मा से कुछ मांग आते हैं कि यह दे देना, वह दे देना, कि नौकरी मिल जाए कि धन मिले कि पद मिले कि प्रतिष्ठा मिले। इनकी प्रार्थना भी वासना का ही प्रच्छन्न रूप है। इनको कुछ पता नहीं है। ये अभागे हैं।
इस संसार में जिसने वासना को ही जाना, मांगना ही मांगना जाना, उससे बड़ा अभागा कोई भी नहीं, क्योंकि वह भिखमंगा है। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय हैं। उसे कभी अपने सम्राट होने का अनुभव नहीं हो पाता। सम्राट होने का अनुभव तो प्रार्थना में होता है, क्योंकि प्रार्थना में भक्त भगवान से भिन्न नहीं रह जाता, एक हो जाता है।
वासना में प्रेमी और प्रेयसी क्षण-भर को मिलते हैं, क्षुद्र है मिलन और फिर लंबा बिछोह है, फिर विषाद है। प्रार्थना में मिलन हुआ सो हुआ-महामिलन है! फिर कोई विरह नहीं, फिर कोई भेद नहीं, अभिन्नता सध जाती है, एकता सध जाती है। अहं ब्रह्मास्मि! तभी कोई घोषणा कर पाता है : अनलक! मैं ही परमात्मा हूं।
दोनों के बीच में प्रेम है। प्रेम ऐसा तीर है, जो कहीं भी नहीं जा रहान वासना की दिशा में, न प्रार्थना की दिशा में ठहरा हुआ तीर है। और निश्चित ही ठहरे हुए तीर को देखकर तुम्हारे मन में सवाल उठेगा : यह कहां जाना चाहता है, क्या है इसका स्वभाव क्या है? इसका लक्ष्य क्या है, गंतव्य क्या है? हजार प्रश्न उठेंगे और कोई उत्तर न आएगा। इस तीर को चलाना मत, क्योंकि चलाया कि तुम वासना में ही चला लोगे। इस तीर को रुके रहने देना। घबड़ाहट क्या है, जल्दी क्या है? थोड़ा धीरज सीखो।
इस सदी में एक चीज खो गई है, सबसे बड़ा गुण अगर ख धीरज। एक बड़ी आतुरता है; सब चीजें जल्दी-जल्दी हो जानी चाहिए, अभी हो जानी चाहिए।
लोग ध्यान भी करने आते हैं तो कहते हैं : एक सप्ताह में हो जाएगा कि दो सप्ताह रुकना पड़ेगा? जैसे दो सप्ताह रुककर वे मेरे ऊपर कोई अनुकंपा कर रहे हों! ध्यान और तुम दिनों में पूछते हो! हिम्मतवर लोग रहे होंगे पुराने दिनों के, वे जन्मों की भाषा में पूछते थे कितने जन्मों में